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Uniform Civil Code लागू की जाए : दिल्ली हाईकोर्ट

हर विशेष समुदाय के लिए अलग कानून तब तक के लिए तो ठीक है जब तक दोनो पछ उसी समुदाय विशेष के हो और दोनों या फिर मामले से तालुक रखने वाले को उस समुदाय के लिए बनाए गए कानून को पूरी तरह स्वीकार करते हो । अन्यथा मामला तब बिगड़ जाता हैं जब किसी मामले में दो पछ हो और दोनों अलग अलग समुदाय से हो, साथ ही दोनो को ही एक दूसरे के समुदाय के बनाए गए कानून से आपत्ति हो। ऐसे में मामले और उलझ जाता हैं, ऐसे में मामले का निष्कर्ष आते आते बोहोत ही समय लग जाता है। अगर आप भारत में रहते है तो आप भलीभाती जानते होंगे की भारत की न्याय व्यवस्था कितनी धीमी हैं और ऐसे मामले में और भी अधिक समय लग जाता है।

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Uniform Civil Code का काफी आसान मतलब है एक देश एक कानून।

कोर्ट ने कहा है की

अब भारत में लोग शादी जाति, धर्म और समुदाय देख के नही कर रहे है लेकिन जब उनका तलाक की अर्जी आती है दोनो अपने अलग अलग विशेष कानून का पालन चाहते है। जिस तरह यह अंतर शादी में खत्म हो गया था उसी तरह सभी प्रकार दूसरे विषयो पर भी समान हो अर्थात् एक देश में एक कानून व्यवस्था हो। इसलिए देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत है और इसे लाने का यही सही समय है।

कोर्ट ने मोदी सरकार इस विषय पर जल्द से जल्द कोई ठोस कदम उठाने को कहा है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह सब कहा है एक तलाक की मामले की सुनवाई करते हुए, असल में पति और पत्नी दोनों अलग अलग समुदाय से वास्ता रखते है। पहले पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की लिए अर्जी डाली लेकिन पत्नी ने यह मांग की, की यह अर्जी खारिज हो क्युकी उसपर हिन्दू मैरिज एक्ट के कानून लागू नही हो सकता, इसपर पति ने पत्नी के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया।

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आखिर क्यों जरुरी है UCC?

UCC यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि धार्मिक समुदाय उदार दृष्टिकोण के फल से वंचित न रहें, वो खुद ही आगे आए और अपनी निजी जीवन के मामलों में कानूनों के समान व्यवहार तथा उसी कानून द्वारा शासित होने के मांग करे जिस से समाज में एकजुटता हो।

UCC लागू करने में दिक्कत क्या है?

समान नागरिक संहिता के संबंध में संभावित गलतफहमी ने विभिन्न धर्मों विशेषकर अल्पसंख्यकों में भय पैदा कर दिया। यह अक्सर कई धर्मों द्वारा देखा जाता है कि यूसीसी का उद्देश्य उनके धार्मिक रीति-रिवाजों और मूल्यों के खिलाफ है। यूसीसी के लागू होने से पहले, अधिकारियों को अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतना चाहिए।

इसलिए यह कहना उचित होगा की किसी भी मामले में, समान नागरिक संहिता लागू नहीं की जा सकती क्योंकि इसके लिए व्यापक सहमति की आवश्यकता होगी।

 

 

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